यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
भगवान श्री कृष्ण का यह मंत्र धर्म और अधर्म की संघर्ष और उनके चक्रव्यूह की व्याख्या करता है। यह मनुष्य को धर्म की प्राथमिकता के बारे में बताता है और संसार की मोह माया से दूर करता है। साथ ही यह मंत्र व्यक्ति के भीतर धर्मपरायणता और समर्पण की भावना को प्रोत्साहित करता है। इस मंत्र का पाठ व्यक्ति को सत्य, न्याय, और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।